Sunday, 5 October 2014

फिल्म कैद पर श्याम नंदन का आलेख



फिल्म कैद पर श्याम नंदन का एक महत्वपूर्ण आलेख जिसे उन्होंने सफदर स्टूडियो दिल्ली में हुई 8 फरवरी 2014  को फिल्म की पहली स्क्रीनिंग में फिल्म देखने के बाद 11 को लिखा था । हालांकि उसके बाद जन सिनेमा द्वारा निर्मित यह फिल्म देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण फिल्म फेस्टेवलों में चर्चा का विषय बनी रही है और लगातार जारी है ।

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फेसबुक, फ्रेंडशिप और फ़िल्म
तक़रीबन दो हफ्ते पहले की बात है, मेरे फेसबुक पेज पर एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आया। रिक्वेस्ट चाहे किसी का हो, मैं स्वीकार जरूर करता हूं। हां, एकबार प्रोफाइल अवश्य देखता हूं। फ़िल्म, साहित्य, मीडिया और अन्य रचनात्मक कार्यों से जुड़े लोगों के फ्रेंड रिक्वेस्ट तो मैं बिना सोचे-समझे एक्सेप्ट करता हूं। यह रिक्वेस्ट भेजने वाले थे, मथुरा के ‘एम गनी साहब’, जो थिएटर और सिनेमा से जुड़े थे। लिहाजा सरसरी तौर पर उनका फेसबुक प्रोफाइल देखते ही उन्हें कन्फर्म कर दिया।
इधर कन्फर्म किया ही था कि चैट इनबॉक्स में उनका अभिवादन “कुमार साहब आदाब” नुमाया हुआ। बड़ा अच्छा लगा, क्योंकि मुझे ऐसे लोग खासे पसंद हैं, जो इस तरह सजग (एक्टिव) होते हैं और पहल करते हैं। कहीं-न-कहीं यह एक-दूसरे से जुड़ने के प्रति एक ललक और सकारात्मक रुझान को दर्शाता है। दो-तीन पंक्तियों में हुई औपचारिक चैटिंग के बाद उन्होंने लिखा “जी कुमार साहब, हमारी फिल्म की पहली स्क्रीनिंग ‘स्टूडियो सफ़दर दिल्ली‘ 8 फरवरी को आयोजित करा रहा है, आप सादर आमंत्रित हैं।”
मेरे जानने वाले जानते हैं कि मैं कैसा और कितना बड़ा फ़िल्मी कीड़ा हूं। गनी साहब का यह आमंत्रण ‘नेकी और पूछ-पूछ’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रही थी। ऊपर से 8 फरवरी दिन शनिवार था, जो कि मेरा वीकली ऑफ़ होता है, मतलब सोने पे सुहागा वाली बात थी। अपनी ख़ुशी दबाते हुए गनी साहब को मैंने जवाब लिखा- “जी, जरूर”।
Poster of Quaid by M Gani

फिर गनी साहब ने मेरा ईमेल आईडी मांगा जो मैंने फ़ौरन से पेश्तर दिया। कुछ यूं मानो अभी-के-अभी ईमेल आईडी न दिया तो किसी प्रोडक्ट के बम्पर ऑफर में मिला एक शानदार प्राइज़ कहीं मेरे हाथ से निकल न जाए। आधे मिनट से भी कम समय में चैट-बॉक्स में उनका सन्देश आया “कार्ड मेल कर दिया है, उसी पर पता लिखा है, 089097***** मेरा फोन है”।

गनी साहब के साथ चैटिंग ख़त्म होने के बाद मैंने अपने जवारी दोस्त रवि श्रीवास्तव ‘मनीष’ को कॉल किया जो आजकल न्यूज़एक्स में विडियो जर्नलिस्ट हैं। वह एक बेहतरीन कैमरामैन है, जो कई हिंदी और भोजपुरी फिल्मों, विडियो अल्बमों और डॉक्यूमेंट्रीज की शूटिंग कर चुका है। रवि भी मेरी तरह एक महान फिल्मी कीड़ा है। सो मैंने गनी साहब के मेल को उसे फॉरवर्ड कर दिया और पूछा कि अगर वह 8 फरवरी को फ्री हो, तो साथ हो ले। रवि को यह मेल करने से पहले मैंने गनी साहब से इसकी परमिशन ले ली थी।
स्टूडियो सफ़दर की तलाश
ऑफिस के असाइनमेंट में व्यस्त होने कारण रवि तो नहीं आ पाया, लेकिन मेरा जाना तय था और मैं डंके की चोट पर गया। गनी साहब ने जो ई-कार्ड भेजा था, उससे पता नोट किया। मालूम हुआ कि स्टूडियो सफ़दर शादीपुर मेट्रो स्टेशन, सत्यम सिनेमा के पास, डीएमएस बूथ के नजदीक है। शो का समय शाम 6:30 बजे निर्धारित था। मैं समय से शादीपुर मेट्रो स्टेशन पहुंचा और बाहर निकल कर एक रिक्शेवाले भाई से पता पूछा तो उसने कहा “सत्यम सिनेमा और डीएमएस बूथ दोनों अलग दिशाओं में है, अब बताइए आपको जाना कहां है?” मैंने कहा- ‘डीएमएस बूथ’।
वही हुआ, जो मेरे साथ अक्सर होता है, मतलब दिल्ली की गलियों में श्यामलीला। जाना था जापान, पहुंच गए चीन यानी स्टूडियो सफ़दर की उलटी दिशा में आ गया था। खैर, गनी साहब का नंबर मिलाया। फोन स्विच ऑफ! मैं भन्नाया- “इसका मतलब शो शुरू हो चुका है और उन्होंने फ़ोन ऑफ कर लिया है, अब क्या करूं?” रिक्शेवाले भईया मेरा मुंह ताक रहे थे। मेरी खुशनसीबी, तभी गनी साहब का जवाबी फ़ोन आ गया। फिर उन्होंने सही रास्ता बताया तो यही कुछेक पांच-सात मिनटों में स्टूडियो सफ़दर पहुंच गया।
A still of Sanju in Quaid


“थैंक गॉड” बोलते हुए मैंने रिक्शे का भाड़ा चुकाया और लगे हाथ कन्फर्म करने की गरज से पास खड़े एक सज्जन से पूछा ‘स्टूडियो सफ़दर यही है न’! वे “हां” बोल ही रहे थी कि एक दरवाजा खुला और अंदर आने का विनम्र इशारा हुआ। जैसे अंदर पहुंचा मेरी दुनिया बदल गयी, रौशनी से एकदम सिनेमा-हाल वाले मेरे सपनों की दुनियां में पहुंच गया, जहां का गहरा सुरमई अंधेरा मुझे बचपन से पसंद है, शायद दीवानगी के हद से भी ज्यादा।
होठों पे चुप्पी, माथे पे शिकन और कुछ सवाल
फ़िल्म शुरू हो चुकी थी। टाइटल पहले से पता था- “क़ैद”। फ़िल्म की कहानी प्रसिद्ध लेखक श्रीमान ज्ञानप्रकाश विवेक जी से साभार ली गयी थी और वे स्वयं भी दर्शक दीर्घा में हाजिर-नाजिर थे (यह फ़िल्म ख़त्म होने के बाद पता चला)। इस शो में लगभग 30-35 दर्शक ही थे, लेकिन जो भी थे प्रबुद्ध थे (यह भी बाद में पता चला)। दर्शकों में कुछ थिएटर से, कुछ फ़िल्मी दुनिया से, कुछ मीडिया से, कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं से, कुछ स्कूल की शिक्षिकाएं थी और कुछ मेरे जैसे यानी फ़िल्मी कीड़ा (यह भी फ़िल्म ख़त्म होने के बाद पता चला)।
फ़िल्म देखकर मुझे केवल और केवल महान फिल्मकार श्याम बेनेगल साहब की याद आई। यह फ़िल्म एक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक फ़िल्म थी, जिसका एक-एक शॉट क्लासिक था। कहानी एक वैसे बच्चे (संजू) की थी, जैसा कि चौथी-पांचवीं क्लास में पढ़नेवाला एक जहीन और हंसमुख बच्चा होता है यानि तेज, शरारती, मजाकिया और समय को अपनी उम्र के हिसाब से मजे में जीनेवाला। लेकिन स्कूल के नीरस शैक्षणिक वातारवरण और शिक्षकों के ईगो और स्वार्थ में फंसकर संजू गहन अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो जाता है।
घरवाले या कहें समाज उसके डिप्रेशन का कारण समझ नहीं पाता है। मासूम संजू इतना ज्यादा डिप्रेस्ड होता है कि उसकी मानसिक दशा उग्र और हिंसक हो जाती है। घरवाले इसे ईश्वरीय कोप और भाग्य का लेखा मानने लगते हैं और अपने बच्चे को अंधविश्वास की अंधेरी गहरी खाई में धकेल देते हैं। ओझा-गुनी, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और गण्डे-तावीज़ के उलूल-जुलूल चक्कर फंसकर में एक मासूम जीवन अंधेरे कमरे में क़ैद कर दिया जाता है।
इस कैद से संजू को बाहर निकालने की कोशिश इस फ़िल्म का सबसे आकर्षक पार्ट है। एक कमरे में कैद संजू अंधेरे और अकेलेपन का ऐसा आदी हो जाता है कि किसी को देखते ही भयानक रूप से चीख उठता है। उफ़! वह चीख अभी तक मेरे जेहन और कानों में गूंज रही है।
कहते हैं, ‘एवरी कलाउड हैज़ सिल्वरलाइनिंग’, जो यहां भी सही सिद्ध हुई। आखिरकार एक संवेदनशील युवा और थिएटर कलाकार संजू की समस्या को समझने में सफल होता है। वह सहज बाल मनोविज्ञान सिद्धान्त के रास्ते पर चलकर संजू को उस क़ैद से मुक्त करता है।
फ़िल्म में संजू का किरदार अदा किया है, मास्टर किशन सिंह ने, जिसकी उम्र महज 10-11 साल से ज्यादा नहीं होगी। मगर उसका अभिनय, माशा-अल्लाह! अभिनय और भाव (एक्सप्रेशन) लाजवाब हैं। चाहे वह कैसा भी दर्शक हो, उसे खुद से कनेक्ट कर लेने में वह सफल रहा है।
संवेदनशील युवा और थिएटर कलाकार की भूमिका अदा किया है, सनीफ़ मदार जी ने। वे वास्तविक जीवन में पेशे से शिक्षक और शौक से थिएटर आर्टिस्ट हैं। उनका चेहरा इस फ़िल्म में के रोल में बड़ा फोटोजेनिक है।
कैसे बनी यह फ़िल्म?
गनी साहब अपने फ़िल्म के पोस्टर पर लिखते हैं- ‘अ फ़िल्म बेस्ड ऑन ज्ञानप्रकाश विवेक्स स्टोरी’ (A film based on Gyanprakash Vivek’s story), फिर नीचे लिखा है- ‘जन सिनेमा प्रेजेंटेशन’ (jan cinema presentation) और सबसे नीचे लिखा है- ‘एम गनी’ज क़ैद’ (m gani’s Quaid)। मुझे इसमें जो सबसे ज्यादा आकर्षक लगा, वह लाईन है- जन सिनेमा प्रेजेंटेशन।
दरअसल जन सिनेमा, जन नाटक, जन मंच आदि से मेरा जुड़ाव बहुत पुराना है। कभी ‘इप्टा’ (IPTA) से जुड़े रहने का जो सौभाग्य मुझे मिला है, इस फ़िल्म के लिए यह आकर्षण उसी का सातत्य है। लेकिन, जन सिनेमा की जो परिभाषा गनी साहब ने दी, वह दिल को छू गयी।
बकौल गनी साहब, उन्होंने कभी फ़िल्म फ़िल्म बनाने के बारे में सोचा ही नहीं था। लगभग दो साल पहले एक मौका आया कि उन्होंने एक कैमरा ख़रीदा, शायद 5D या 7D (गनी साहब कृपया स्पष्ट करेंगे और क्षमा भी कि कैमरे का ब्रांड और नाम याद नहीं रख पाया)। उन्हीं दिनों उनकी निगाह श्री ज्ञानप्रकाश विवेक जी की कहानी पर गयी और बस फ़िल्म बनाने का मन बन गया।
लेकिन, सिर्फ मन बनने से या एक कैमरा होने से फ़िल्म थोड़े ही न बन जाती है। लेकिन बात केवल मन की नहीं थी, बात थी दृढ़ निश्चय, रचनाधर्मिता, लगनशील और जुझारू होने का। शायद किसी भी इंडस्ट्री में एक न्यू कमर को इन्हीं औजारों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। फिर भी, बात डेढ़ घंटे की एक फ़िल्म बनाने की हो, तो पर्याप्त बजट चाहिए, कलाकार चाहिए, एडिटिंग स्टूडियो और कुछ आवश्यक इक्विपमेंट, मसलन लाईट्स, लेंस, रिफलेक्टर चाहिए।
AM Gani after show with Audience


लेकिन गनी साहब ने सोच लिया था कि फ़िल्म बनानी है, तो बनानी है। और फ़िल्म बनी, शानदार बनी। कलाकार के रूप में थिएटर के कुछ साथियों ने उनकी मदद की, तो कुछ परिचितों ने भी साथ दिया, बिना कोई पैसा लिए। वे अपने हर्जे-खर्चे से शूटिंग पर आते थे।
एडिटिंग स्टूडियो के रूप में गनी साहब के एक मित्र ने ‘प्रीमियर प्रो’ पर एडिट करने का वादा किया और निभाया भी, लेकिन बड़े रोचक तरीके से। हुआ यह कि उनके मित्र किसी जरूरी प्रोजेक्ट में बिजी रहते थे, सो वे गनी साहब को फ़ोन पे इंस्ट्रक्शन दिया करते थे कि अमुक तरह से कम्यूटर खोलिए, यहां क्लिक कीजिए, ये कट लगाइए वगैरह-वगैरह। इस प्रकार करते-करते गनी साहब भी एडिटिंग सीख गए।
रहा सवाल लाईट्स, लेंस, रिफलेक्टर जैसे उपकरण का, तो कहते हैं न, जहां चाह, वहां राह। बकौल गनी साहब, दिन में सूर्यदेव का प्रखर किरण, रात में बिजली के बल्ब या ट्यूबलाइट का सहारा था, लेकिन विशेष प्रभाव उत्पन्न करने के लिए उन्होंने बैटरी वाली 3-4 घरेलू टॉर्च और मोबाइल के लाईट का इस्तेमाल किया।
डबिंग के लिए जो तरीका उन्होंने अपनाया, वह भी बड़ा लाजवाब था। जब उन्होंने यह तरीका फ़िल्म की समाप्ति के बाद दर्शकों को बताया तो सभी खूब हंसे। डबिंग में सबसे बड़ी समस्या एम्बिएंस के न्वॉयज यानि अनपेक्षित आवाज या शोर को रोकने की होती है, जिसके लिए साउंड-प्रूफ स्टूडियो की शरण लेनी होती है।
लेकिन, उनकी टीम ने यह काम बंद कार के अंदर किया, जो शायद रात के सन्नाटे में या सुनसान जगह पर किया गया होगा। बकौल गनी साहब, इस फ़िल्म में चार-पांच किरदारों के आवाज उन्हीं की आवाज में है। कारण? बस यह कि जो किरदार थे, वे कलाकार नहीं थे, उन्हें डायलॉग याद नहीं रहते थे।
सबसे इंटरेस्टिंग बात तो यह कि पूरी फ़िल्म बनते-बनते दो साल बीत गए। इस दरम्यान संजू का किरदार निभाने वाले किशन सिंह, उनकी बड़ी बहन और अन्य स्कूली बच्चे बड़े हो गए। इससे मुझे भी यह समझ में आया कि दो साल बच्चों के शारीरिक विकास के लिए कम समय नहीं होता है। फिल्ममेकिंग के कई रोचक प्रसंग होते हैं और इस फ़िल्म के लिए भी हैं। उसे तफसील से फिर कभी बताऊंगा। यहां अहम है इस फ़िल्म के सन्देश को समझना।
Sanif, lead actor and Sir Gyan Prakash Vivek, writer


तो, जो मुख्य सन्देश इस फ़िल्म से निकलकर आती है, वह है कि एक उत्साही व्यक्ति 85 मिनट की एक शानदार फ़िल्म बनाता है, जिसकी चर्चा एक मैगज़ीन में आउटलुक के आलोक मेहता करते हैं, जनसत्ता अख़बार में खबर छपती है और थिएटर की दुनिया के लोग वाह-वाह कहते हैं।
और, सबसे बड़ी बात तो यह कि आज के 50 करोड़, 100 करोड़ की लागत से फिल्में बनाने वालों को यह फिल्म एक नसीहत देती है। मुझे लगता है, भारत में समान्तर सिनेमा का पुनरोदय होने वाला है, जन सिनेमा का ज्वार चढ़ने वाला है। कम से कम बजट की अच्छी फिल्में दर्शकों और घरों तक पहुंचने वाली हैं।
बस गनी साहब, फिर वही कहूंगा जो फ़िल्म देखने के बाद स्टूडियो सफ़दर में कहा था – “पहली फ़िल्म है, शानदार है, मनोरंजक है”। कहने वालों ने बहुत कुछ कहा, मसलन एडिटिंग में लोचा था, डबिंग में खामियां थीं, एक्टिंग और बेहतर होती, स्क्रीनप्ले, डायरेक्शन और कसी होनी चाहिए, लाम-क़ाफ़, वगैरह-वगैरह।
लेकिन साहब, मेरी नजर में फ़िल्म लाजवाब है, मनोरंजक है, सन्देश देने में कामयाब है। गनी साहब, सैल्यूट।

फिल्म - कैद
प्रस्तुति - जन सिनेमा
अवधि -  85 मिनट
कहानी - ज्ञानप्रकाश विवेक
पटकथा एवं संवाद - एम0 हनीफ मदार
निर्देशक - एम0 गनी
मुख्य पात्र--
किशन सिंह -            संजू
एम0 सनीफ मदार -      रंजन
राहुल गुप्ता -            तांत्रिक
राजेश श्रीवास्तव -        पिता
बॉबीना  -                मम्मी
रीता शर्मा -               हिन्दी अध्यापिका
अजय नागर -             गणित अध्यापक
संदीपन नागर -           प्रधानाचार्य
अनीता  -                मालती
दिलीप रघुवंशी -           दुकानदार
 



 




मैं भी आती हूं ....! (कहानी)

(कहानी)                                                   मैं भी आती हूं ....!
           एम0 हनीफ़ मदार
       हरिया पेड़ के नीचे बैठा एकटक खेत में चलती जे सी बी को देख रहा था। पेड़ की डालियां हवा में लगातार झूम रही थीं लेकिन नीचे बैठा हरिया तनिक भी हिलडुल नहीं रहा था। न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था जैसे मशीन के लोहे के मजबूत पैर उसकी छाती पर जमे हैं। और वह अपने पंजे गढ़ा-गढ़ा कर खेत से मिट्टी नहीं उसकी आत्मा को निकाल रही है और वह चीख भी नहीं पा रहा है जैसे वह मन मसोस कर किसी कैन्सर के दर्द को सहन करने का प्रयास कर रहा है। वहीं बैठे बैठे खेत के चारों ओर की मेंढ़ों पर लगे पॅापूलर के पेड़ों पर नजर पड़ते ही उसकी आंखों की चमक बढ़ गई। उसे हवा में झूमते पेड़ ऐसे जान पड़े जैसे वे सब अपने बंधन तोड़ देना चाहते हैं और अगले ही पल वे सब मुक्त हो कर दौड़ पड़ेंगे उसे बचाने को। पिछले पांच दिनों से वह इसी नीम के पेड़ के नीचे आ बैठता है। यह पेड़ उसके बाबूजी ने यहां लगाया था तभी उसने ख़ुद अपने हाथों से यह बाकी के सब पेड़ लगाये थे और अपने बच्चों की तरह इनकी देखभाल भी की थी। तभी तो एक दिन बाबूजी ने उसकी पीठ थपथपाई थी और कहा था ‘‘हरिया तूने तो कमाल कर दिया हमें तो लगता था कि यहां यह पेड़ होंगे ही नहीं।’’
‘‘बाबूजी यह पेड़ नहीं मेरे बच्चे हैं।’’ कितनी मासूमियत से हरिया ने जवाब दिया था। उसकी इस मासूमियत पर बाबूजी भी मुस्करा पड़े थे।
       पेड़ के नीचे बैठे हरिया को अब बड़े हो चुके यही पेड़ वास्तव में बेटा बेटी नज़र आ रहे थे जो उसे बचाने को हाथ पैर पटक रहे हों। हिम्मत पाकर उसने एक लम्बी सांस भरी। शरीर की इस हरकत से उसकी तन्द्रा टूट गई जैसे वह मशीन के चंगुल से मुक्त हुआ हो। वहीं बैठे-बैठे उसने पहलू बदला। आसमान में सूरज ढलान के रास्ते पर आ चुका था। पेड़ों की छाया अपनी जड़ें छोड़ने लगी थी। हरिया को भी भूख लगने लगी थी। उसने पास रखी पोटली खोली जिसमें रोटियां बंधी थीं। खेतों के चारों ओर नज़र डालते हुए ठीक वैसे ही खाने लगा जैसे रोटी खाकर अभी उठेगा और आलुओं में खाद फैलाने लगेगा।
       हरिया ने जब से होश संभाला है इसी पेड़ के नीचे बैठ कर उसने रोटी खाई है। शादी के कुछ दिन बाद, मां के लम्बी बीमारी से गुजरने के बाद, उसकी पत्नी रोटी लेकर खेत पर आती थी तो वह खेत के उस कोने से सब पेड़ों को छोड़कर इसी नीम के नीचे आकर रोटी खाने बैठता था। उसकी पत्नी समझती थी कि मुझे ज़्यादा न चलना पड़े इस लिए दौड़कर इस कोने पर आ जाते हैं रोटी खाने । लेकिन एक दिन हरिया खेत के ठीक उस कोने पर सरसों में पानी लगा रहा था। सरोज यह सोच कर कि, उधर से इधर दौड़ेंगे तो और थक जाएंगे रोटी लेकर वहीं पहुंच गई। लेकिन हरिया रोटी लेकर उसी पेड़ के नीचे आने लगा तो सरोज रास्ते भर खिसियानी बिल्ली सी पीछे-पीछे चलती रही। और उसने धम्म से बैठते हुए पूछा ‘‘इस पेड़ में ऐसे क्या लाल लटके हैं .... जो इसके अलावा किसी पेड़ के नीचे तुम्हारी रोटी हजम नहीं होती ?’’ कहते हुए सरोज की दोनों भंवें आपस में मिल गईं थीं । पहले तो हरिया उसका चेहरा देखकर जोर से हंसा तो सरोज और खिसियानी सी हो गई। हरिया मुस्कराते हुए बताने लगा ‘‘यह पेड़ मेरे पिताजी ने लगाया था। जब मैं बड़ा हुआ तो हम दोनों यहीं बैठकर रोटी खाते थे....... आज भी लगता जैसे पिताजी साथ में खा रहे हैं।’’
‘‘अब तुम्हारे पिताजी तो रहे नहीं, फिर भी पूरा खेत पार कर के यहीं रोटी खाते हो, पेड़ तो सब पेड़ हैं किसी के नीचे बैठकर खा लो .......?’’
’’तू नहीें समझेगी ....... इस पेड़ की छाया मुझे ऐसी लगती है जैसे इस धूप में पिताजी ख़ुद मेरे सिर पर हाथ फैलाए खड़े हैं।’’ कहते हुए हरिया ठंडी सांसों से भर उठता था।
पत्नी चंचल हो उठती ‘‘मुझे कुछ नहीं समझना है।’’ कहते हुए हरिया के गले में बांहें डाल देती। हरिया उसे झिड़क देता ‘‘पागल हो गई है बाबूजी आ रहे होंगे।’’
‘‘हूं ..... तुम्हारे बाबूजी .....।’’ पत्नी तिलमिला कर सुर्ख हो जाती और मुंह फेर कर बैठ जाती। एक दिन तो हरिया की पत्नी ने हरिया को बातों ही बातों में चूम लिया। हरिया शर्म से लाल पढ़ गया वह पत्नी से कुछ न कह सका, बघुआया सा इधर-उधर देखने लगा कि कहीं किसी ने देख न लिया हो। उसकी पत्नी उसकी इस हालत पर खिलखिला कर लगातार हंसे जा रही थी।
‘‘किसी ने नहीं देखा बुद्धू डरपोक ..... इस दोपहरी में कौन बाहर निकलेगा हमें देखने को ......?’’ हरिया की पत्नी ने दुहरे होते हुए कहा।
‘‘क्यों, टट्टी पेशाब पर किसी का वश चलता है कोई बैठा हो इधर-उधर .....?’’ हरिया ने आंख निकालीं थीं।
‘‘देख ले तो कौन-सा पाप कर दिया हमने .....?’’ कहते हुए उसकी पत्नी शरमाई-सी सहमते हुए बोली और उसने हाथों की अंगुलियों से खेत की रेत में छोटे-छोटे गड्ढे बना दिए थे।
‘‘तू कल से रोटी लेकर मत आना। मैं सुबह साथ ही ले आया करूंगा .....।’’ हरिया ने उसे डांटते हुए घर भेज दिया था। तब से हरिया सुबह ही कपड़े में रोटी बांध लाता है।
       हरिया ने रोटी का पहला निवाला तोड़ा ही था कि खेत के किनारे सड़क पर कार रुकते देख उसकी आंखें किसी बाघ की तरह ऐसे चमकने लगीं जैसे पिछले पांच दिनों से वह इसी के इन्तज़ार में आ बैठता है। हरिया कार को पहचान गया था यह वही कार है जो उस दिन बाबूजी की कार के साथ आई थी .......।
       हरिया खेत के दूसरे कोने से दौड़कर बाबूजी के सामने हाथ जोड़कर आ खड़ा हुआ था। बाबूजी के साथ दूसरी कार में आये लोगों को देखकर हरिया तनिक भी असहज नहीं हुआ था बल्कि भीतर ही भीतर प्रफुल्लित हो रहा था। असल में बाबूजी के साथ यकलख़्ता जब भी कोई मिलने या खेत देखने आता तो हरिया इसी तरह दौड़कर उनके पास आ खड़ा होता था। जल्दी से ट्यूबवैल की कोठरी से चारपाई निकाल देता। यह बात उसे उसके पिताजी ने ही सिखाई थी। बाबूजी साथ आये लोगों के साथ बैठते हुए हरिया को शाबाशी देते कहते थे ‘‘यही है इन खेतों का मालिक। इसी की देख-भाल में सब कुछ हो रहा है।’’ जब इन शब्दों से बाबूजी हरिया की तारीफ करते और साथ आए लोग भी उसे शाबाशी देते तो वह गर्व से फूल जाता था। उसे लगता ही नहीं था कि वह खेत का मालिक नहीं नौकर है।
       उस दिन भी हरिया ऐसा ही सोच कर मन ही मन खुश होते हुए चारपाई निकाल लाया था लेकिन बाबूजी उन लोगों के साथ बात-चीतों में ऐसे मशगूल थे कि उन्हें हरिया का ध्यान ही नहीं रहा। वे किसी तहसील और कचहरी की बातें कर रहे थे। हरिया को यह सब कुछ अटपटा भी लगा लेकिन उसने सोचा कोई ज़्यादा जरूरी बात होगी इसलिए ध्यान नहीं रहा है। उसने बाबूजी का ध्यान अपनी ओर दिलाने को साहस करके बीच में छेड़ा ‘‘बाबूजी .......वो ..... आलू ..... आलू का बीज नहीं आया है आप ख़बर कर देते तो .... ?’’ और नज़रें बचाकर इधर-उधर ऐसे देखने लगा जैसे कुछ खोज रहा हो लेकिन उसकी मंशा पूरी हो गई बाबूजी का ध्यान हरिया पर हो गया ‘‘हां...... आलू अब मंगवा नहीं रहे हैं, इसलिए मैंने ही मना कर दिया है।’’ कह कर बाबूजी तो साथ आए लोगों के साथ बातों में फिर जुट गये। हरिया सुन कर उछल पड़ा ‘‘तो कल क्या करूंगा.......? और आलू भी तो पिछैता हो जाएगा !’’ हरिया का विचलन बाहर आ गया था।
‘‘अरे अब कैसा अगाया और पिछाया जब करना ही नहीं तो .....।’’ मुस्कराते हुए कह कर बाबूजी और साथ आये लोग हंस पड़े थे। हरिया को लगा आपस में मज़ाक कर रहे हैं या हमसे कोई भूल हो गई है तभी तो आज हमारी तारीफ नहीं की है फिर भी उसने हिम्मत कर के पूछ ही लिया ‘‘क्यों .... बाबूजी .....?’’
‘‘अरे जब खेत ही नहीं रहेगा तो खेती कैसे होगी .....?’’ बाबूजी फिर हंसे ‘‘और हां तू भी अब कुछ और काम तलाश ले ..... क्यों कि यह खेत हमने बेच दिया है।’’
       सुनते ही हरिया ऐसे छटपटाया जैसे बाबूजी ने उसके सिर पर कोई भारी पत्थर दे मारा हो। जैसे उसके पेट में चाकू मार दिया हो। हरिया चीखने को था लेकिन न जाने कैसे उसकी आवाज़ ही नहीं निकली। पल भर पहले उसके चमकते चेहरे पर एक साथ मनों मिट्टी की परत चढ़ गई। उसे काटो तो खून नहीं। बाबूजी और साथ आये लोग बेपरवाही से खेत में घूमने लगे थे। हरिया की जैसे जड़ें मिट्टी में वहीं के वहीं इतनी गहरी समा गई कि वह हिल भी नहीं पा रहा था। पल भर में ही उसके भविष्य के तमाम सपने किसी रेत की तरह उड़ने लगे थे। अचानक उसे कुछ याद आया तो उसने पूरी ताक़त लगाकर अपने पैर ज़मीन से उखाड़े और लगभग घिसटता हुआ-सा बाबूजी के पास तक पहुंचा।
‘‘लेकिन ..... बाबूजी .... मुझसे भी .....?’’ कराहता हुआ सा वह कहने को था कि मुझसे भी तो पूछ लेते .....। लेकिन वह पूरी बात कह पाता उससे पहले ही बाबूजी उसे अनदेखा कर साथ आये लोगों की बातों में फिर व्यस्त हो गये थे। यह देखकर हरिया के शब्द गले में ही कहीं गांठ बनकर अटक गये थे। इस एक पल ने उसे सिखा दिया था कि वह इन्सान नहीं रईसों का एक सस्ता खिलौना है जिसे जब तक जी चाहा खेला फिर बिना सोचे समझे फेंक दिया। उसकी नियति मालिक को खुश करना ही है उसके दिल से जुड़ना नहीं।
बाबूजी चलने लगे तो उसने बड़ी हिम्मत के साथ कुछ याद दिलाना चाहा ‘‘बाबूजी .....!’’ बाबूजी के सामने अक्सर चहकने बाला हरिया उस दिन एक बार में बस इतना ही कह पाया था कि उसके पैर कांपने लगे थे।
‘‘हां बोल बेटा ....?’’ बाबूजी के शब्द अब भी मिश्री में डूबे थे ‘‘बता बता, क्या बात है ......?’’
‘‘बाबूजी .... वो ...... वो आपने कहा था कि इसी खेत के किसी कोने में तुझे थोड़ी जगह दे दूंगा ......?’’ इतना कहने में हरिया ने कई बार सांस ली थी जैसे पूरे शरीर की ताकत इकट्ठी करता रहा हो।
‘‘आ ..... अच्छा .... अच्छा .....।’’ बाबूजी को वे शब्द याद आए थे जो उन्होंने हरिया के बाउ से मरते समय कहे थे।
श्यामा घर में लम्बी-लम्बी सांसें ले रहा था। बाबूजी देखने आये थे। श्यामा उठकर बैठना चाहता था लेकिन उठ नहीं सका था। श्यामा की आंखों से आंसू निकल रहे थे तब बाबूजी ने पूछा था ‘‘क्यों परेशान है श्यामा ....?’’
‘‘बाबूजी ....! हरिया का ब्याह भी हो गया .... लेकिन इसके लिए एक छोटे से घर का जुगाड़ नहीं कर पाया। किराये का घर बूढ़े शरीर की तरह है न जाने कब खाली करना पड़े ... बाबूजी इसने तो इस शहर में इन खेतों के अलावा कुछ देखा भी नहीें है .....?’’ श्यामा न जाने क्या कहते कहते रुक गया था। तब बाबूजी ने श्यामा की पीठ थपकी थी ‘‘हरिया केवल तेरा ही बेटा है श्यामा ..... मेरा कुछ नहीं है क्या .....? सब जुगाड़ होगा और फिर न मैं कही जा रहा और न ये खेत फिर क्यों परेशान होता है ? इसी खेत में से किसी कोने पर इसे थोड़ी सी जगह दे दूंगा, जिससे इसके रहने का जुगाड़ बन जायेगा। तू इसकी चिन्ता छोड़ और आराम कर ठीक हो जायेगा।’’ श्यामा शायद बाबूजी के पांव पकड़ लेता लेकिन वह उठ नहीं पाया था सो केवल हाथ जोड़ कर रो पड़ा था तब श्यामा की आंखों से आंसू नहीं उसकी बेवशी आंखों से बहकर दोनों कानों तक जा रही थी। बाबूजी वापस आ गये थे।
हरिया के बाउ के मरने के कुछ दिन बाद ही बाबूजी ने हरिया से कहा था ‘‘बेटा शहर में रह कर कुछ करना है तो फिजूल खर्ची से बचे रहना। मेरी तो एक सलाह है कि खाने-पीने के लायक मुझसे पैसे ले लिया कर .... बाकी ..... मैंने सोच रखा है कि जब घर बनाए तब इकट्ठे ले लेना तेरे काम आयेंगे।’’
‘‘बाबूजी आप जैसे चाहें, अब आप ही तो हैं आपके अलावा मैंने तो कुछ देखा ही नहीं जो कुछ सोचूं और कहूं  .....।’’ उसके बाद से आज तक बाबूजी जो देते रहे हरिया उसी में जैसे भी हो सका अपना पेट भरता रहा। इसी लालच में कि चलो बच्चे होंगे तब तक बाबूजी घर तो बनवा ही देंगे।
       बाबूजी ने मुस्कराते हुए साथ के लोगों से कहा था ‘‘भाई इसको किसी कोने में रहने लायक जगह दे देना ..... इसके बाप ने हमारी बड़ी सेवा की है।’’ कहते हुए बाबूजी की मुस्कान कुछ अजीब सी हो गई थी। उन लोगों ने भी ‘‘ठीक है’’ कहा और चले गए थे।
       हरिया तब तो संतोष से भर गया था किन्तु दूसरे ही दिन जब हरिया ने उन लोगों से खेत पर पूछा था कि ‘‘साहब मेरी जगह कहां है  ?’’ हरिया इतना ही कह पाया था कि उन लोगों ने उसे मां-बहन की गन्दी गालियां देकर भगाया था। तब से हरिया इन लोगों से खार खाए बैठा है।
       कार रुकती देखते ही हरिया किसी शिकारी चीते की भांति उठ खड़ा हुआ। उसके दोनों हाथों की मुट्ठियां कुछ इस तरह कसमसाने लगीं कि उसके हाथों की मांसपेशियों में भी जकड़न होने लगी। सफ़ेद झक कुर्ता-पायजामा में कार से वही आदमी उतरा जो उस दिन बाबूजी के साथ आया था। न जाने मन में क्या ठानकर हरिया आगे बढ़ता कि तभी कार में से दो बन्दूकधारी भी उतरे। इन हट्टे-कट्टे शक्ल से ही डरावने दिखते लोगों के हाथों में बन्दूकें देखकर हरिया सहमकर ठिठक गया। उसके हाथों की कसावट ढीली पड़ने लगी। हरिया ने ऊपर पेड़ पर नज़र डाली जो अब भी मस्ती में झूम रहा था। जैसे वह उसके बाल सहलाना चाहता है। दोनों बन्दूकधारियों के साथ उस आदमी को अपनी तरफ बढ़ता देख बिना कुछ सोचे समझे हरिया चुपके से घर की ओर खिसक गया।
       घर जाते हुए न जाने हरिया को ऐसा क्यों लग रहा था कि पीछे से कोई उस पर गोली चला देगा। बड़े लोग हैं इनका कोई क्या बिगाड़ लेगा। यह सोचते ही वह तेज-तेज कदमों से चलने लगता। ‘मैंने उनका क्या बिगाड़ा है जो मेरे साथ .....?’ मन में ऐसे ख्याल आते ही उसकी चाल धीमी हो जाती। इसी उधेड़-बुन में घर पहुंचते-पहुंचते वह इतना थक गया कि उसके पैर किसी शराबी की तरह यहां वहां पड़ने लगे। फिर भी वह साहस करके घर में किसी से बिना कुछ कहे सुने छत पर ऐसी जगह जा कर बैठ गया जहां से खेत और खेत में खड़े नीम के पेड़ को आसानी से देख सके।
       शाम होते सूरज की लालिमा से नीम के पेड़ पर निकलती छोटी-छोटी कोंपलें गहरी नारंगी हो चली थीं। खेत में मशीन अब भी अपना काम कर रही थी। किन्तु उसकी धड़धड़ाती आवाज़ उसके पास पहुंचकर उसे बेचैन नहीं कर पा रही थी। हरिया को नीम के पेड़ पर चमकती किल्लियां खिलते हुए नारंगी फूल-सी दिख रहीं थीं। इन्हें देखकर हरिया बड़ा सुकून महसूस कर रहा था जैसे उसे किसी ने अपनी गोद में लेकर उसके बालों को सहलाना शुरू कर दिया हो, इस आनन्द में ही उसकी आंखें मिचने लगीं। उसे आज अपने बाउ की बहुत याद आने लगी थी। वह बाउ की हर बात को दुहरा लेना चाहता था।
       जब से उसने होश संभाला और देखना शुरू किया तो अपने बाउ को इसी खेत की मिट्टी में मिले हुए देखा। पास के स्कूल में भी उसका नाम श्यामा से कहकर बाबूजी ने ही लिखवाया था। यह बात भी े उसके बाउ ने ही उसे बताई थी। दरअसल उसे स्कूल इन्टरवल तक ही सुहाता रहा। उसका इतना समय भी स्कूल की रसोई में बड़े-बड़े बर्तनों की आवाज के सहारे कट जाता था। जहां दलिया खाने को मिला कि सीधे खेत में। नीम के नीचे मिट्टी में पैर रख कर उस पर लगभग गीली-सी मिट्टी चढ़ाकर थपकना फिर धीरे से पैर निकालना। उस अजीब तरह की बनी खोली को वह अपना घर कहता। ‘‘बाउ देखो घर बन गया .....।’’ बाउ वहीं से कह देते ‘‘ठीक है तू देख मैं पहले काम कर लूं फिर देखूंगा।’’ वह जिद करता ‘‘अभी आकर देखो ..... फिर टूट जायेगा।’’ जैसे वह यह समझने लगा था कि हमारे घर टूटने या बिखरने को ही बनते हैं। बाउ विवश होकर घुटने तक कीचड़ में सने पैरों के साथ बाहर आते और देख कर उसकी पीठ थपथपाते जैसे उसने वह सपना पूरा कर दिया हो जिसे वे वर्ष से देखते आ रहे हैं।
       हरिया को लगा उसके बाउ उसकी पीठ थपथपा रहे हैं। उसने हकबका कर आंख खोली। सुनीता उसके पास बैठी उसे जगा रही थी। पत्नी को सामने देखकर हरिया सकपका कर निःसहाय सी नजरों से सुनीता को ताकने लगा। पिछले पांच दिनों से वह सुनीता को रोज ही कहकर जाता रहा है कि आज शाम को आकर तुम्हें जरूर बता दूंगा कि हमें कोन-सी जगह मिली है। फिर पूरे खेत में लगाये अपने पेड़ पौधों को अपनी जगह में फिर से उगा लूंगा। जबकि सुनीता पहले दिन से ही कहती रही है ‘‘कुछ और काम तलाश लो वहां तुम्हें कुछ नहीं मिलने वाला। अब वहां तुम्हारे बाबूजी का कुछ नहीं रहा।’’ 
       हरिया को लगा सुनीता अब भी यही सब कहेगी इसलिए वह पत्नी के कुछ बोलने से पहले ही कह उठा ‘‘मैं हिम्मत नहीं हारुंगा ..... सुनीता! मैं, .... मैं कल बाबूजी के पास जाऊंगा .... जब वे कहकर गए हैं तो वह क्यों नहीं देगा हमारी जगह ?’’ कहते-कहते हरिया के होंठ थरथराने लगे। सुनीता समझ गई कि उसका पति आज पूरी तरह हार गया है लेकिन वह अपने बाबूजी पर किये गये विश्वास के टूटने के डर से बस लड़ रहा है। सुनीता पर हरिया की यह हालत देखी नहीं गई। उसने बिना कुछ बोले ही हरिया के लगभग कांपते बदन को पूरी तरह से अपनी बांहों में समेट लिया। हरिया के दिनभर का मानसिक तनाव सुनीता के आंचल में पिघलकर आंखों से बह निकला।
‘‘तुम्हीं पागल हुए हो ..... मैं तो मना करती हूं।’’ सुनीता ने धीरे से कहा। हरिया कुछ नहीं बोला उसके दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। उसे अपने बाउ की वे बातें याद आ रही थीं जो उन्होंने मरते समय हरिया से कहीं थीं। ‘‘बेटा सुभाष बाबू का साथ मत छोड़ना। इस परदेस में सिर्फ वे ही तो अपने  हैं। यह शहर है। यहां पड़ोसी-पड़ोसी को नहीं जानता। कुछ और नहीं तो, वे अपने गांव के तो हैं। उन्हीं के बल पर हमने अपनी पूरी जि़न्दगी काट दी। वे ही हमें लेकर आए थे गांव से और फिर उन्होंने कह भी दिया है इसी खेत में से थोड़ी जगह हमें देने की। सुभाष बाबू वचन के बड़े पक्के आदमी हैं। गांव भर में इसी लिए उनकी इतनी इज़्ज़त थी। बेटा सुभाष बाबू का साथ मत छोड़ना ..... ।’’ कहते कहते उनकी दोनों आंखों से दो बूंद इधर-उधर लुढ़क गईं थीं। फिर वे कभी नहीं बोले।
       उसकी समझ से अभी तक यह बात बाहर थी कि आखिर हमने बाबूजी को कहां छोड़ा है बल्कि खुद उन्होंने ही हमें अपने से दूर कर दिया खेत किसी और को दे कर। उसे बाबूजी पर गुस्सा आने लगा कि आखिर उनके पास क्या कमी थी जो यह खेत बेच दिया। क्या करेंगे वे इतने रुपयों का, खानी तो आखिर दो रोटी ही हैं। उसका मन तो हो रहा था कि अभी जाकर पूछे बाबूजी को कि यह खेत आखिर आपको क्या नुकसान दे रहा था। खुद ही तो कहते थे ‘अगर पेड़-रुख नहीं रहे हरिया तो यह धरती एक दिन मिट जाएगी। और अब खुद ही उसको बेचकर .....?’ लेकिन न जाने क्या सोच कर हरिया रह गया। हां इतना तो उसने जरूर तय कर लिया था कि सुबह उनके पास जाऊंगा जरूर।
इसी उधेड़-बुन में हरिया को नींद नहीं आ रही थी। बस सुबह होने का इन्तज़ार था। उसे बार-बार करवट बदलता देखकर उसकी पत्नी की आंख खुल गई। उसने मुड़कर देखा वास्तव में हरिया जाग रहा था।
वह उठ कर बैठ गई उसे देख हरिया भी उठ बैठा ‘‘क्यों नींद नहीं आ रही ..... अब छोड़ो उस जगह और ज़मीन को कोई और काम तलाश लो ऐसे रोज़-रोज़ जागते रहकर मारोगे क्या .....?’’
‘‘अब जि़न्दगी तो हमने इन खेतों में काट दी और कोई काम हमें आता हो तब तो तलाशेंगे। हम कहते थे बाउ से कुछ और काम करने की, सीखने की, तो कह देते थे ‘बेटा कहां जाएगा ......? इन खेतों में ही काम कर ले ..... अब इन खेतों में बाबूजी तो काम करने से रहे हम ही तो करते हैं और हमें ही करना है।’’
‘‘तो ऐसे जागने से क्या पाओगे सो जाओ, दिन में सोच लेना .....।’’ सुनीता की इस बात पर हरिया आंखें बन्द करके फिर लेट गया लेकिन उसे आशंका थी कि बाबूजी कहीं निकल न जांय इसी डर से वह रात भर सो नहीं सका ‘कहीं आंख लग गई और देर में खुली तो .....?’ आखिरकार उसने सुबह भी नहीं होने दी और घर से निकल ही लिया। सुनीता को तो तब पता चला जब वह बाबूजी के घर से लगभग आठ बजे लौटकर आया। हरिया की आंखें चमक रहीं थीं। ‘‘मैंने कहा नहीं था कि बाबूजी मेरे साथ ऐसा नहीं करेंगे ।’’ उसके शब्द बच्चों की तरह उछलते लग रहे थे।
‘‘आखिर क्या कह दिया तुम्हारे बाबूजी ने .....?’’ सुनीता की उत्सुकता चरम पर थी।
‘‘अरे कहना क्या था, उन्होंने फोन पर उस सेठ को सब समझा दिया है। अब उसने खुद मुझे बुलाया है। कह रहे थे ‘‘चला जइयो सेठ जी बता देंगे तेरे लिए जगह। अब मैं जा रहा हूं वहीं खेत पर।’’
‘‘अरे कुछ खा तो जाते, चाय ही पी जाओ .....।’’ सुनीता चहक रही थी।
‘‘पागल! तुझे पता नहीं कहां से आया हूं ..... बाबूजी ने चाय नाश्ता सब करवा दिया है। आखिर हमारे गांव के हैं, शहरी नहीं हैं कि काम खत्म तो पहचानते नहीं।’’ हरिया इठलाया और खेत की ओर निकल गया।
       हरिया को देखते ही नीम का पेड़ तालियां बजा-बजा कर झूमने लगा। हरिया उसे देखकर तनिक मुस्कराया और जाकर उसके मोटे तने से टिक कर बैठ गया। उसने एक नज़र पूरे खेत पर डाली जहां हरिया कल तक आलुओं की मेंढ़ बनाता था। लहलहाते धानों से बातें करता था। पत्तों की खड़खड़ाहट के साथ गीत गुनगुनाता था। वहां लम्बी-लम्बी उदास सड़कें अलसाई सी पड़ी हैं। उसके रास्ते में जो भी पेड़ आया उसका वज़ूद खत्म कर दिया गया। कटे पेड़ों के सूखे पत्ते देखकर उसकी आंखें नम हो गईं। उसे अपनी हालत भी उसी कटे पेड़-सी जान पड़ रही थी। जो केवल छटपटाने के अलावा इस खेत को बचाने के लिए चाहकर भी कुछ नहीं कर सका। वह समझ गया था बाधा बनने पर इन्हीं पेड़ों की तरह हरिया बीते समय की बात बन जाएगा। उसे फिर भी संतोष था कि नीम का यह पेड़ बचा हुआ है। जिसके नीचे आकर वह बैठकर रो तो सकता है। ‘‘सब किस्मत है इस खेत की और मेरी भी।’’ यही सोचकर हरिया सेठ जी की गाड़ी का इन्तज़ार करने लगा।
       धूप से तपिश बढ़ने लगी तो गर्म हवाओं को शीतल करने में नीम का पेड़ लगभग नाकाम सा होने लगा। लेकिन हरिया को हवा के ठण्डे या गर्म हो जाने का ध्यान ही नहीं था। वह तो बस सेठ जी की गाड़ी का इन्तज़ार करते-करते बस इस सोच में डूबा हुआ था कि आखिर ’यहां कौन लोग रहने आऐंगे , जिनके पास रहने को घर नहीं है ..... या वे सब मेरे जैसे होंगे ..... या कोई और .....? पिताजी बताते थे शहरों में एक आदमी के पास चार-चार बड़े-बड़े घर होते हैं। क्या करते हैं इतने घरों का यह लोग। और एक दिन सब खेत ही मिट जाएंगे तब खाएंगे क्या, घरों के ईंट पत्थर, आखि़र इन्हें कोई समझाता क्यों नहीं! इन पर इतना पैसा कहां से आता है .....? भगवान जाने ..... जरूर कुछ उल्टा सीधा करते होंगे। इन्हें भगवान से डर नहीं लगता .....! कैसे होते हैं ये लोग .....?’ इन्हीं सब सवाल-जवाबों में उलझे हुए न जाने कब हरिया नीम के पेड़ से टिका-टिका ही सो गया।
       सूरज ने रुख बदला तो निशाना सीधा हरिया बन गया। हरिया को लगा जैसे उसका बदन किसी भट्टी पर रख दिया है। वह बिलबिला कर उठा। सामने सेठ जी की गाड़ी खड़ी थी। देखते ही हरिया के अन्दर एक ठण्डक सी दौड़ गई। खेत में सबसे पहले बनी कोठरी नुमा आॅफिस में हरिया ने झांक कर देखा सेठ जी अन्दर बैठे हैं। वह सहमा-सा दरवाजे पर जा खड़ा हुआ। सेठ जी की जलती सी नजर पड़ते ही हरिया सकपकाया सो बोला ‘‘मैं हरिया साब ..... इस खेत की देख-भाल ..... मैं .... वह बाबूजी ने आपका....।’’ हरिया का वाक्य पूरा नहीं हो पाया था कि सेठ जी की खरखराती सी आवाज ने उसे चुप कर दिया।
‘‘हां ..... हां बाबूजी ने हमें सब समझा दिया है ..... बैठ जा अभी बताते हैं ..... वही देख रहे हैं।’’ कह कर सेठ जी मेज़ पर बिछे कालिन्द्री कुन्ज का नक्शा खंगालने लगे।
       पीछे आॅफिस की परछाई खेत में फैली थी। हरिया उसी छाया में जा बैठा। अब नीम का पेड़ ठीक उसके सामने चिलचिलाती धूप में भी किसी फौजी की भांति सीना ताने खड़ा था। हरिया को लगा वह नीम का पेड़ नहीं पिताजी खड़े हैं। और कह रहे हैं बेटा सुभाष बाबू बड़े अच्छे आदमी हैं उनका साथ मत छोड़ना। हरिया मन ही मन बुदबुदाया .... पिताजी मैं क्या करता, खेत तो तुम्हारे बाबूजी ने ही बेच दिया अब तुम उन्हीं से पूछना कि इस खेत ने उन्हें क्या कुछ नहीं दिया, क्या कमी थी उनके पास जो उन्होंने इसे बेचा वह भी उन लोगों को जिनके पास पहले ही चार चार घर हैं। अब क्या मैं अपना हिस्सा भी छोड़ दूं और फिर यहां रहूंगा तो आपसे बातें भी करता रहूंगा, और मैंने नहीं छोड़ा है बाबूजी को ....। अभी हरिया यह सब बुदबुदा ही रहा था कि सेठ जी ने बाहर आकर उसे आवाज दी ‘‘हरिया ..... अबे कहां गया .....?’’ ‘‘हां साब .....!’’ कहते हुए ऐसे आ खड़ा हुआ जैसे वह बाबूजी के सामने आ खड़ा होता था।
       सेठ जी ने छोटू से कहा ‘‘इसे पार्क वाली जगह बता दे .....। चल जा।’’ कहते हुए सेठ जी ने हरिया को छोटू के साथ जाने का इशारा कर दिया था।
‘‘बाबूजी पार्क वाली जगह में, मैं .....?’’ हरिया उसी मुद्रा में गिड़गिड़ा पड़ा।
‘‘चल जा ..... अब छोटू समझा देगा .....।’’ सेठ जी ने लापरवाही से कहा और कोठरी में वापस मुड़ गये। हरिया उसी मुद्रा में छोटू के साथ चल दिया । ‘‘देख ! हम कोई पार्क-वार्क नहीं छोड़ते ..... जगह बिकने तक बस ग्राहकों को दिखाने भर की चीज़ होता है ये सब। फिर तू कोन-सा उसमें अभी घर बना रहा है। घर बनाने के लिए भी तो आज ढेर पैसा चाहिए ...? यह तू भी जानता है।  इस लिए अभी तो तू इसमें पेड़-पौधे फुलवारी सजा अच्छा लगेगा। कुछ दिनों में तेरे पास भी कुछ इन्तज़ाम हो जाएगा और सेठ जी के भी सब प्लॉट बिक जाएंगे फिर तू आराम से अपना घर बना लेना।’’ छोटू हरिया को समझाता गया। हरिया आश्वस्त-सा हुआ तो पूछ बैठा ‘‘भइया बाबूजी ने आपको भी कोई जगह देने का वचन दे रखा है क्या ....?’’ छोटू गुर्राया ‘‘अबे मैं कोई नौकर नहीं हूं वे मेरे बड़े भाई हैं।’’ सुनकर हरिया एक दम शान्त हो गया।
छोटू निशान लगवा कर चला गया। हरिया नीम के पेड़ से थोड़ी दूर पर ही जगह पाकर खुश हो गया और एक दम शान्त खड़ा होकर नीम के पेड़ को लगभग डबडबाई आंखों से ताकता रहा। कुछ दिन में ही लगभग अठारह सौ वर्ग फुट का वह ज़मीन का टुकड़ा हरिया के छोटे खेत में तब्दील हो गया। हरिया मजदूरी को जाने लगा तो सुनीता अपने छोटे खेत में खड़े पेड़-पौधों तथा सब्जियों की देख-रेख में मगन ।
हर रोज़ शाम को दोनों हिसाब लगाते। हरिया हिसाब समझाता ‘‘देख दो सौ रुपये मिलते हैं मुझे तू पचास में खर्चा चला डेढ़ सौ रोज के हिसाब से साल भर में बहुत हो जाएगा फिर बन जाएगा हमारा घर।’’
‘‘लेकिन तुम्हारे बाबूजी कहते थे कि ..... पेड़-पौधे नहीें रहेंगे तो यह धरती ही मिट जाएगी फिर घर ही कहां रहेगा .... और फिर पूरे महीने में पन्द्रह दिन ही काम मिल पाता है तुम्हें, तो सौ रुपये रोज़ ही तो रह गये उस पर यह मंहगाई .....।’’ हरिया ने सुनीता की बात को बीच में काट दिया ‘‘तू कहना क्या चाहती है .....?’’
‘‘मैं सोच रही थी घर तो यही ठीक है जैसा भी है। हां सेठ जी मुझसे अपने घर पर काम की कह रहे थे। बोल रहे थे यहां कोन-सी दो चार ट्रक सब्जी हो जाएगी जो यहां पड़ी रहती है। मेरे घर सुबह शाम काम कर दिया कर, यहां कौन इसे उखाड़े ले जा रहा है ?’’ सुनीता ने एक दिन शाम को यह बात हरिया को बताई तो सुनीता की बात सुन कर हरिया बिदक गया ‘‘न मैं उन्हें जानता न ही तू .... फिर बाबूजी कहते तो बात भी ठीक थी।’’
‘‘अब यहां तुम्हारे बाबूजी तो हैं नहीं जो कहते।’’
‘‘हां तो क्या हुआ मैं कल पूछ आऊंगा .....।’’
‘‘पूरी जि़न्दगी बाबूजी से पूछते रहो ..... सांस लेने की भी उन्हीं से पूछो .... अब तक तो तुम्हारे लिए कुछ किया नहीं तुम्हारे बाबूजी ने, अब उद्वार करेंगे ....?’’
‘‘क्यों ....? क्या नहीं किया बाबूजी ने। यह जगह नहीं दी .... दिलवाई तो उन्होंने ही .....।’’
‘‘तो क्या ऐहसान कर दिया, पूरे जीवन पिताजी की और तुम्हारी कमाई नहीं खाई .... दे दी यह एक मुट्ठी जगह .....।’’
‘‘उन ने कौन सी कमाई खाली मेरी ....? उन्होंने कह तो दिया था घर बनाएगा तब पैसे दे देंगे तो हम घर तो बनाएं।’’
‘‘मैं तो कहती हूं हमारा पैसा है हमें दे दें हमें नहीं बनाना कभी घर .... तो क्या कभी नहीं देंगे....?’’
‘‘क्यों नहीं देंगे, मैंने ही नहीं मांगे हैं।’’
‘‘तो मांग कर देख लो ..... जब पैसा मिल जाएगा तो मैं भी काम पर नहीं जाऊंगी, मुझे क्या जरूरत होगी फिर।’’
‘‘मैं मांग लाऊंगा लेकिन तुझे काम पर जाने की जरूरत नहीं है किसी का क्या भरोसा .....? कल ही जाकर मैं बाबूजी से पैसे ले आऊंगा।’’
       हरिया बाबूजी से हुई कोई भी बात सुनीता को नहीं बताना चाहता था। लेकिन हरिया के न चाहते हुए भी उसके भीतर की कुछ उलझन उसके चेहरे पर उतर आई थी। जो सुनीता से छुपी न रह सकी ‘‘क्या बात है क्यों परेशान हो ....?’’
‘‘तू हर समय मेरा चेहरा ही क्यों देखती रहती है .... कुछ भी नहीं है बस थोड़ा थक गया हूं।’’
‘‘अब सीधे से बताओ क्या कह दिया ..... तुम्हारे बाबूजी ने ....?’’
हरिया कुछ देर चुप रहा फिर ‘‘कह रहे थे तेरा इतना पैसा नहीं है कि घर बन जाए ..... और कह रहे थे जगह कहां भागी जा रही है कुछ और कमा धमा ले फिर ले लेना .....।  हां और कह रहे थे मैं तो अभी दे दूं लेकिन तेरे पास खर्च ही तो हो जाएंगे। मुझे लगा ठीक ही तो कहते हैं।’’ हरिया ने कनखियों से सुनीता को देखते हुए कहा। सुनीता को हरिया की मासूम निरीहता पर तरस और खीझ एक साथ आए लेकिन न जाने क्या सोचकर वह चुप रह गई।
       अभी कुछ ही दिन ही गुजरे थे कि काम पर जाते हुए हरिया ने देखा उसके छोटे खेत में कुछ लोग फावड़ा चला रहे हैं। हरिया दौड़कर उनसे जा भिड़ा ‘‘क्या कर रहे हो ? तुम इसे क्यों उजाड़ रहे हो .....?’’ 
लोगों ने हरिया को धकिया दिया ‘‘कौन है रे कौन है तू ....?’’
‘‘ये .... ये मेरी जगह है .....।’’
‘‘अच्छा .....! किस ने कह दिया ? जा पहले सेठ जी से पूछ।’’
‘‘हां मैं अभी बुला लाता हूं ।’’ कहता हुआ हरिया सेठ जी की कोठारी की तरफ दौड़ा।
       हरिया को काटो तो खून नहीं जब सेठ जी ने भी कह दिया हां वह जगह बिक गई है। हरिया को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या कहे। यह तो इन्होंने पार्क की जगह बताई थी और कहा था ‘इसकी तेरे नाम कोई लिखा पढ़ी नहीं हो सकती। और फिर जब हमने तुझे दे दी तो कौन तुझसे छीन रहा है इसे।’ फिर भी इन्होंने इसे बेच दिया और मुझे पूछा भी नहीं। बाबूजी से कहूंगा यह तो बहुत झूठा है .... तो क्या बाबूजी भी .....। नहीं बाबूजी झूठे नहीें हो सकते। सोच कर हरिया ने हिम्मत से कहा ‘‘लेकिन यह जगह तो बाबूजी के कहने पर आपने  मुझे दिलवाई थी।’’
‘‘हां तो मैंने मना कहां किया है बस जगह बदल दी है। तेरे बाबूजी से पूछ कर ही बदली है। हमारा विश्वास नहीं तो पूछ लेना अपने बाबूजी से।’’ हरिया को कुछ भी सूझ नहीं रहा था बस सोच रहा था आखिर बाबूजी ने क्यों कहा होगा .... फिर भी अगर बाबूजी ने कहा है तो उन्होंने सोच समझ कर शायद ठीक ही कहा होगा।  अभी हरिया सोच ही रहा था कि
‘‘कुछ ज़्यादा मत सोच वह नीम के पेड़ वाली जगह तुझे दे दी है। अब तू तो समझेगा नहीं .....! बेटा हमने सारे प्लॉट ऊंची जाति वालों को बेचे हैं ..... वैसे मुझे या तेरे बाबूजी को तुझसे कोई परेशानी नहीं है लेकिन अब बीच में तेरे रहने से लोगों को समस्या थी। हालांकि तू ..... तू समझ रहा है न।’’ सेठ जी ने समझाते हुए उसे थपथपाते हुए लगभग धकिया दिया। हरिया को एक बारगी लगा उसे गहरी गाली दी है लेकिन न जाने उसे क्या हुआ कि नीम के पेड़ वाली जगह मिलने के नाम पर वह सब भूल गया।
       हरिया को उम्मीद थी सुनीता भी सुन कर खुश होगी लेकिन सुनीता परेशान थी। ‘‘तुम मान क्यों नहीं लेते तुम्हारे इन दोनों बाबूजियों की नीयत मुझे ठीक नहीं लगती।’’
‘‘तू हमेशा से बाबूजी पर शक करती रही है। बाउ के सामने भी करती थी। बाउ कितनी बार कहते थे सुनीता हमारे बाबूजी ऐसे नहीं हैं।’’
‘‘काश आज बाउ जिन्दा होते अपने बाबूजी के इस सेठ की ये गाली सुनने को जो आज तुम सुन कर आये हो।’’ कह कर सुनीता घर के कामों में तो लग गर्ई लेकिन उसका मन आशंकाओं से खाली नहीं हो पाया था। वह हरिया से कुछ और भी कहती लेकिन हरिया ने उसे बोलने ही कहां दिया ‘‘सुनीता तू कुछ भी कह लेकिन मैं खुश हूं, अब मैं नीम के नीचे बैठकर तसल्ली से रोटी तो खा पाऊंगा। ठीक ऐसे जैसे बाउ के साथ खाता था।’’ हरिया को खुश होते देख सुनीता भी चुप लगा गई।
       सुनीता का डर बहुत जल्दी सच बनकर सामने आ गया। नीम के पेड़ के नीचे कुछ भीड़ इकट्ठी थी। कुछ लोगों के हाथ में कुल्हाड़ी और आरा था। हरिया ने भीड़ के अन्दर जा कर देखा पेड़ काटने की तैयारी थी। हरिया भौंचक था। उसने भीड़ में देखा सेठजी एक पंडित जी के साथ खड़े थे। हरिया चीख़्ा पड़ा यह पेड़ नहीं कटेगा। भीड़ में एक बारगी सन्नाटा छा गया। सबकी निगाहें हरिया पर आकर रुक गईं। ‘‘मूर्ख यह धर्म का काम है इसमें टांग मत अड़ा ..... पुण्य का काम है यह।’’ पंडित जी ने हरिया को समझाते हुए हटाया। ‘‘बाबा यह मेरा पेड़ है, मेरी जगह है यह, इसे मेरी मर्जी के बिना कैसे काट लोगे आप ...? नहीं तो आप सेठजी खड़े हैं इनसे पूछ लो इन्होंने यह जगह मुझे दी है।’’
‘‘यह जगह मन्दिर के लिए ही है। यह मैं सबको पहले ही बता चुका हूं। और मैं तो इसे जानता तक नहीं कौन है यह .... हटाओ इसे यहां से और काम चालू करो।’’ कह कर सेठजी वापस चले गये। सेठजी की यह बात सुन कर हरिया बघुआया-सा आंखें फाड़े चारों ओर ऐसे देखने लगा जैसे किसी अपने को खोज रहा हो। लेकिन यहां उसे जानने वाला कोई नहीं था। यह सब यहां नये आ बसने वाले वे लोग थे जो उस कॉलोनी में अभी आ बसे हैं ।
हरिया को जब कोई आश न रही तो वह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगा। ‘‘मैं आपके हाथ जोड़ता हूं। यह पेड़ मेरे बाउ ने लगाया था इसे मत काटो ..... मन्दिर बना लो .... मुझे जगह मत दो .... लेकिन इसे तो कम से कम मत काटो।’’ कहता हुआ हरिया लगभग रो पड़ा । लोगों को जैसे कुछ हमदर्दी हुई तो पूछ लिया ‘‘ऐसा क्या है यार इस पेड़ में।’’
‘‘क्या है मतलब .... अरे कुछ नहीं है ..... बस यह पेड़ है जो नहीं कटना चाहिए।’’ सुनीता ने भीड़ को चीरते हुए अन्दर आकर ऊंची आवाज़ में कहा। अचानक सुनीता को वहां देखकर हरिया की भी हिम्मत बढ़ गई। और हरिया पेड़ से चिपक कर खड़ा हो गया।
‘‘अजीब दादागीरी है इन दोनों की, अरे हटाओ इन को .....।’’ ऐसी बातों से पब्लिक में शोर बड़ा। किसी ने कहा पुलिस को फोन कर दो, सेठजी को बुलाओ। वे देखें, ये क्या आफ़त है। अरे यार नक्शे में देख लो यह मन्दिर के लिए छोड़ी गई जगह है। तो फिर हटाओ इनको और काम चालू करो। मुहूर्त का समय निकल रहा है।
हरिया को लगा अब यहां उसकी कोई सुनने वाला नहीं है। साथ ही कुछ लोगों को अपनी ओर बढ़ता देख हरिया ने लपक कर एक कुल्हाड़ी उठा ली और गुर्राया ‘‘आओ कौन आता है।’’ हरिया की आंखों में उतरता हुआ खून देखकर लोग ठिठक गये। अचानक भीड़ ने जगह दी और पुलिस अन्दर आ गई। उसने आनन फानन में हरिया को गिरफ्तार कर लिया। सुनीता ने पुलिस के सामने हाथ जोड़े इनकी कोई ग़लती नहीं यह लोग ही हमारी जगह पर कब्ज़ा कर रहे हैं और यह पेड़ काट रहे हैं। आप चाहो तो इस खेत के पहले मालिक इनके बाबूजी को फोन कर के पूछ लो वे सब बता देंगे उनके कहने पर ही सेठजी ने हमें यह जगह दी है।’’
‘‘हां हमें तेरे बाबूजी ने ही फोन पर ख़्ाबर दी है तभी हम आऐ हैं, आते होंगे तेरे बाबूजी। कह रहे थे इसे ज़्यादा चर्बी चढ़ी है थोड़ी उतर जाएगी तो ठीक रहेगा। इस लिए तू हट जा नहीं तो उठा के रख लूंगा तुझे भी इसी जीप में समझी, चल हट।’’ दरोगा सुनीता को हड़का ही रहा था कि धूल उड़ाती बाबूजी की गाड़ी आकर रुकी। ‘‘ले आ गए तेरे बाबूजी .....।’’ कहता हुआ दरोगा हरिया को खींचता चल दिया लेकिन बाबूजी को देखकर हरिया की आंखें चमकने लगीं। वह अकड़ में आ गया और हाथ छुड़ा कर बाबूजी के सामने जा खड़ा हुआ। अभी वह कुछ नहीं बोल पाया था कि बाबूजी की आवाज़ गूंजी ‘‘कितना शरीफ था इसका बाप, उसने कभी मुंह नहीं खोला .... लेकिन इसके दिमाग में बहुत गर्मी चढ़ी है। अब देखो पुण्य के काम में बाधा डाल रहा है .... ले कर जाओ इसको।’’ बाबूजी ने दरोगा को देखते हुए कहा । सुनते ही हरिया का दिमाग जैसे सुन्न हो गया। उसने बाबूजी के चेहरे को गौर से देखा यह सोच कर कि क्या वाकई यह वही बाबूजी हैं, बाउ जिनकी बहुत तारीफ करते थे। बाबूजी ने हरिया से नजरें नहीं मिलाई वे आगे बढ़ गये। पुलिस ने हरिया को जीप में बिठा लिया। तभी अचानक एक थप्पड़ की आवाज़ से सन्नाटा पसर गया लोगों की सांसें रुक गईं। सिपाही और दरोगा भी दंग और भौंचक्के देखने लगे। सुनीता बाबूजी को थप्पड़ मार कर अभी तक किसी सांप की तरह फुंफकार रही थी। इस से पहले कि कोई कुछ कहता सुनीता ख़ुद हरिया के पास जीप में जा बैठी। वह अभी तक गुस्से से कांप रही थी। हरिया की मुट्ठियां भिंच गई थीं। अचानक हरिया चिल्लाया बाबूजी ! अभी एक हाथ था बहुत जल्दी हजारों हाथ होंगे। जीप चली गई हरिया की आवाज़ दूर जाते तक आती रही थी। 

Saturday, 4 October 2014

हैडलाइन (लघुकथा)

एम0 हनीफ मदार
 (लघु कहानी)

हैडलाइन


 
‘तोरा मन दर्पण कहलाए...... भले बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाए.......’ रिंग टॉन के रूप में सिंह साहब के फोन पर यह गाना बजने लगा। सिंह साहब ने फोन देखा और कान पर लगाया..... ‘‘जी सरकार...! क्या आदेश है.......?’’
‘‘अरे यार परसों हाई कमान आ रहे हैं...... कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मीटिंग बुलाई है....।’’
‘‘सरकार मेरे लिए क्या आज्ञा है उसे बताओ.........?’’
‘‘भाई ऐसा है कि वे यहां नाइट स्टे करेंगे....... तो .......!’’
‘‘समझ गया सरकार......बस इतना बता दो माल देशी हो या विदेशी..........!’’
‘‘देशी ही भिजवा दो यार ....... विदेशी को बचा रखो.... कुछ हमारा भी तो ख्याल रखो......!’’
‘‘होटल का कमरा नं0 फोन पर मैसेज कर देना... और..... आपसे कहना क्या... बस...... प्रसाद ठीक-ठाक भिजवा देना।’’
‘‘परेशान न हो.......!’’
‘‘ओ के सरकार......।’’ कह कर सिंह साहब ने फोन काट दिया ।
सिंह साहब ने कपड़े पहने और दीनपुर गांव की ओर चले गये और कुछ घंटों में ही वापस आ गये। दूसरे दिन घर लौटते-लौटते सिंह साहब को शाम हो गई। पत्नी ने पूछा ‘‘आज छुट्टी वाले दिन भी सुबह से गायब रहे..... कहां गये थे...?’’
‘‘अरे आज कई जलसे, जुलूसों और मीटिंगोंं में शामिल रहा।’’
‘‘कैसे जलसे, जुलूस........?’’
सिंह साहब कुछ बोलते कि फोन फिर से बजा ‘तोरा मन दर्पण कहलाए......’ सिंह साहब ने फोन उठाया ‘‘हां सरकार हो गया...।’’
फोन कटते ही पत्नी ने फिर पूछा ‘‘बताया नहीं कोन सा जुलूस ?’’
‘‘सुबह अखबार की हैडलाइन में देख लेना ...।’’ कह कर सिंह साहब कपड़े उतारने में व्यस्त हो गये।
सुबह अखबार में दंगा पीडि़तों के समर्थन में निकले जुलूस में सबसे आगे झंडा लेकर चलते हुए सिंह साहब अपना फोटो पत्नी को दिखा रहे थे। बगल में छपी खबर उनकी हथेली से दब गई थी जिसमें लिखा था दीनपुर गांव की एक और लड़की ने की आत्म हत्या।

चांद भाई (लघुकथा)

एम0 हनीफ मदार
(लघु कहानी)

 चांद भाई

 
 
‘‘तो इस तरह हम आपको बता चुके हैं कि चुनाव जीतने के लिए अभी हमारी सबसे बड़ी चुनौती है अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने की। इस दिशा में हमें क्या करना चाहिए, कैसे करना होगा। इन सवालों पर हम आपसे सुझाव लेना चाहते हैं।’’ इतना कह कर हाई कमान ने अपनी बात खत्म की और हॉल में बैठे कार्यकर्ताओं पर एक सवालिया नज़र डाली।
‘‘हमें अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों को फ्री शिक्षा की बात करनी चाहिए।’’ एक कार्यकर्ता ने उठ कर कहा।
‘‘हमें उनको आरक्षण दिलवाने की बात करनी चाहिए।’’ दूसरे कार्यकर्ता ने बताया।
‘‘उनकी अविकसित बस्तियों को विकसित करा देने की बात करनी चाहिए।’’ एक और कार्यकर्ता ने कहा।
कोई चौथा बोलने को था कि हाई कमान ने हाथ के इशारे से रोक दिया। ‘‘इसके अलावा कुछ और कहना हो किसी को तो ही बोले। एक भी दमदार सुझाव नहीं आया खैर..... हम लोग मीटिंग के बाद तय करके बता देंगे कि क्या कार्यक्रम है और कैसे फॉलो करना है..? ठीक है अब हमें चलना है।’’
हाई कमान चलते हुए अचानक रुके और पीछे बैठे हल्की दाढ़ी वाले कार्यकर्ता से पूछ बैठे ‘‘अरे चांद भाई आप हैं यहां तो आप ही बताइये न कैसे जीतें हम आपका विश्वास....? क्या करें...?’’ कहते हुए हाई कमान गम्भीर हो कर चांद साहब का चेहरा ताकने लगे। तभी एक आवाज आई ‘‘लेकिन सर ये तो शर्मा जी हैं.......।’’ सुनते ही हाई कमान की आंखें अजीब तरह से चमकी वे खुश होकर चांद साहब के पास आये और गर्मजोशी से हाथ मिलाया ‘‘यार आप शर्मा हैं .....।’’ और चांद साहब के गले लग गये और ऊंची आवाज में बोले ‘‘आज से इन्हें कोई चांद नहीं कहेगा ....... यार हम आज तक समझते थे कि ये तो............।’’

Friday, 3 October 2014

सांस्कृतिक आन्दोलन की भूमिका

सांस्कृतिक आंदोलन की भूमिका
      एम0 हनीफ़ मदार
आज जिस दौर में हम जी रहे हैं वहां सांस्कृतिक आंदोलन की भूमिका पर सोचते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक दूसरे के पूरक दो शब्दों के निहितार्थाें के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस होने लगी है। क्याेंकि आज सांस्कृतिकता का पूरक आंदोलन शब्द ही हाशिये पर जा पहुंचा है। तब इस पड़ताल की आवश्यकता इस लिए और बड़ जाती है जब इन दोनों शब्दों के बीच रिक्तता की खाई को बड़ी संजीदगी से,े वे बाजारू ताकतें अपनी चमकीली हलचलों को, सांस्कृतिक आंदोलन बताकर, पूरे वर्गीय संघर्ष को भरमाने और पलीता लगाने में जुटी हैं। जब देश के बड़े मध्य वर्ग के बीच नवजागरण का स्थान दैवीय जागरण ने ले लिया है और पूरा मध्य वर्ग आंखें मूंदे किसी समतामूलक समाज की कामना में तल्लीन है। ठीक उसी समय सांप्रदायिकता का खतरनाक खेल, बाज़ारबाद, निजीकरण और सबसे ऊपर विकास का नाम देकर अपने संसाधनों को, कॉर्पोरेट के लिए जमकर लूटने की खुली छूट देने के उभार बेचैन करते हैं।
मैं निर्विकल्प होकर किसी निराशावाद से घिरे होने की बात नहीं कर रहा लेकिन, प्रेमचन्द, मुक्तिबोध, कैफी आज़मी, भीष्म साहनी, यशपाल, साहिर लुधियानवी, नागार्जुन, अली सरदार जाफरी, फ़ैज़, मज़ाज़ जैसे नामों की रोशनी में खड़ा हुआ साहित्य सांस्कृतिक क्षेत्र का प्रगतिशील आंदोलन जो एक समय देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन था, जैसे किसी आंदोलन जिससे किसी बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सके, के बिना कोरे आशावाद से सहमत होना भी आज के दौर में कम-अज-कम तर्क संगत नहीं लगता।
हमेशा से ही सांस्कृतिक आंदोलन के कुछ निश्चित लक्ष्य तय रहे हैं लेकिन इन आंदोलनों की सबसे बड़ी भूमिका जनमानस को एक दिशा देने की रही है। हालांकि आज इसका कई स्तरों पर फैलाव हुआ है लेकिन आपसी बिखराव ने भी इसे कम नुकसान नहीं पहुंचाया। आज हमारे भीतर की उलझन एक और एक ग्यारह के बजाय तीन तेरह के सिद्धांत की होने लगी है। व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा हमारे सांस्कृतिक आंदोलन के सामाजिक लक्ष्यों पर भारी पड़ रही है जो न केवल उन परिवर्तनगामी बिन्दुओं को ही पीछे धकेल रही है बल्कि हमारी सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि भी धुंधली कर रही है। इसी का परिणाम है कि आज हमारे बीच क्षणिक सांस्कृतिक प्रतिबद्धता नजर आती है जो छोटी-छोटी महत्त्वाकांक्षाओं के पूरे होते ही गायब हो जाती है और फिर वही लाभ और स्वार्थ के सौदे होना शुरू हो जाता है।
जबकि वैचारिक रूप से राजनैतिक चेतना को, लोक जनमानस की समझ के स्तर पर, सांस्कृतिक रूप से सही दिशा में ले जाने के महत्त्वपूर्ण सवालों के साथ, सामाजिक, आर्थिक दृष्टिकोण से बदलाव के इस दौर में हमारे सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरतें हमें सांस्कृतिक आंदोलन से भरे अतीत से सबक लेने को विवश करती हैं। अचम्भा नहीं कि उन्नीस सौ तीस-चालीस के दशकों में समूची भारतीय सृजनात्मकता में इन्हीं चिन्ताओं और समतामूलक समाज की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है। जिन्हें उस समय के साहित्य, कला और संस्कृति के लोग मिलकर सूत्रबद्ध तरीके से आंदोलन का रूप देकर मुखरित कर रहे थे। हालांकि इन आंदोलनों से पहले कला व साहित्य आधुनिकता से तालमेल कर चुके थे। कहानी, कविता, नाटक और फिल्मों के रूप में, लेकिन एकीकृत रूप में वे स्थानीय आम व लोक जीवन तक नहीं पहुंच पाये थे। ऐसे में लोक जीवन तथा देहातों तक राजनैतिक चेतना को सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में पहुंचाने में इप्टा जैसे संगठनों की जो भूमिका उस समय नजर आती है आज ऐसी सांस्कृतिक लगन और सामाजिक प्रतिबद्धता की ऊर्जा नजर नहीं आती।
ऐतिहासिक दस्तावेजों की रोशनाई में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि उन सांस्कृतिक आंदोलनों का ही असर था कि आम जन की चेतना तक यह बात पहुंच पा रही थी कि स्थानीय जातीयता की बातें करने के बजाय, हमें अपनी स्थानीय संस्कृतियों व सामाजिक मूल्यों के बचाव के लिए, एक बड़ा वैश्विक दृष्टिकोण चाहिए। चूंकि सन तीस-चालीस का दशक भी सांस्कृतिक, सामाजिक, और आर्थिक रूप से बड़े परिवर्तन का समय था। सत्ता परिवर्तन की शंका आशंका और सामन्ती व्यवस्था से जकड़े ऐसे दूभर समय में, इन सांस्कृतिक आंदोलनों का ही नतीजा था कि किसानों के बड़े संगठन बने। छात्रों के संगठन, लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों के संगठन बने जो समाजवादी विचारधारा के प्रसार और उसी वैश्विक जनदृष्टि से पश्चिमी पूंजीवाद तथा भीतरी सामन्तवाद का डटकर मुकाबला करने का स्वर प्रखर कर रहे थे। जो लेखक कलाकार पश्चिमी आधुनिकता के दबाव में बिखरकर अपनी संस्कृति से भटक रहे थे उन्होंने भी सांस्कृतिक रूप से ग्रामीण भारत तथा लोक जन जीवन की ओर रुख किया। कहना न होगा कि हिन्दी, उर्दू के अलावा भारत की भिन्न भाषाओं में लोक जीवन से जुड़ी कहानियां, नाटक, कविताएं तथा गीत, लोकगीत उसी सांस्कृतिक आंदोलन के ताप का परिणाम था।
बात आज की करें तो सवाल उठता है कि आजादी के बाद भी क्या वैचारिक, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से हम आजाद हो पाए हैं। क्या हम पश्चिमी पूंजीवाद और भीतरी सामन्तवाद की जकड़न से मुक्त हो पाए हैं। फिर क्यों और किस भ्रम में हम हम अपने सांस्कृतिक आंदोलनों की आग को ठण्डा होते देखकर भी शान्त हैं। सांस्कृतिक रूप से हमारी इसी शिथिलता का नतीजा है कि हमारे पाठ्यक्रम में से प्रेमचंद, यशपाल, परसाई जैसे लेखकों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। नतीजतन वर्तमान युवा पीढ़ी प्रतिरोध से अनभिज्ञ है। वह, भगत सिंह को राजनैतिक रूप से एक विश्वदृष्टा, समाजवादी क्रान्तिकारी के रूप में न जानकर एक आक्रांता के रूप में पहचान रही है। भगत सिंह की आजादी के मायने तथा आजाद भारत के समाजवादी लोकतंत्र में, सामाजिक व्यवस्था के संपूर्ण कार्यक्रम से यह पीढ़ी अनजान है जबकि तब ऐसा नहीं था। इसका अंदाजा भगत सिंह की उस बात से लगाया जा सकता है जो उसने फांसी से पहले अपने साथी सुखदेव से कही थी कि ‘मरा हुआ भगत सिंह अंग्रेज सरकार के लिए जीवित भगत सिंह से ज्यादा खतरनाक सिद्ध होगा।’
बावजूद इन स्थितियों परिस्थितियों के सामाजिक बदलाव की तीव्र चाह समाज में आज भी मौजूद है, वही स्पिरिट और जुनून के साथ। इसलिए आज ज्यादा विपरीत और चुनौतीपूर्ण हालात के बाद भी सार्थक नाटकों, कविताओं, कहानियों, या फिल्मों के माध्यम से, अलग-अलग जगहों पर सांस्कृतिक आंदोलनों को हवा दी जा रही है। लेकिन, सांस्कृतिक धारा के यह वारिस यूं अलग अलग, अकेले दम पर, क्या वर्तमान परिस्थितियों में उत्पन्न सामाजिक चुनौतियों और उनके तकाजे की पूर्ति कर सकते हैं......। फिर ऐसे हालात में इस पर पुनर्विचार न करने का कोई कारण नहीं है। खासकर तब, जब साहित्य व कलाकर्मी, सांस्कृतिक आंदोलन के इतिहास का पुनर्मूल्यांकन व विश्लेषण करने की दिशा में उतने सक्रिय दिखाई नहीं देते जितनी समय की आवश्यकता है। मुश्किल तब और खड़ी होती है जब ऐसी वर्कशॉप, चर्चा, परिचर्चा के दौरान हम वैचारिक रूप से सार्थक समझ परोसने के बहाने, अपने पूर्वाग्रहों, स्वनिर्मित अवधारणाओं के जरिए दबी हुई किसी व्यक्तिगत अंतर्ग्रंथि के स्थापत्य का मौका ढूंढ लेते हैं और कुछ नामों उनकी सफलता, असफलता उनके लेखन या क्रियाकलापों में सही गलत को ढूंढ़कर, अपना गुस्सा या भड़ास निकालकर खुद को सही साबित करने में अपना वक्त खराब करते हैं। कई दफा तो हम उन्हीं राजनैतिक शक्तियों के प्रति अपनी वफादारी को आच्छादित रखने को प्रगतिशीलता की प्रासंगिकता का नाटक तक रचते हैं जबकि भीतर से उन्हीं शक्तियों के प्रति आस्थावान बने रहते हैं।
आवश्यकता है अपनी व्यक्तिगत संकीर्णताओं को तोड़ने की, और अलग-अलग बिखराव में सांस्कृतिक रूप से छोटे-छोटे आंदोलनों को खाद-पानी देने में जुटे संगठनों को इतिहास से सबक लेकर, एकरूपता में सूत्रबद्ध तरीके से विभिन्न सांस्कृतिक क्रियाकलापों के उत्साह के साथ एक बड़े सांस्कृतिक आंदोलन की भूमिका की दिशा में प्रयासरत होने की। सोचने वाली एक और बात है कि हमारे सांस्कृतिक क्रमों में वर्तमान युवा और नई पीढ़ी की सहभागिता न के बराबर रह गई है। इसके पीछे छिपे कारणों की पड़ताल की आवश्यकता है इस परिप्रेक्ष्य में यहां सज़्जाद ज़हीर द्वारा 1936 में साहित्यिक सांस्कृतिक आंदोलन की इसी विकासयात्रा पर लिखा गया यह कथन ज्यादा प्रासंगिक होगा ‘‘हम बाहर से कोई अजनबी दाना लाकर अपने खेत में नहीं बो रहे थे। नये साहित्य और कला के बीज हमारे देश के ही विवेकशील वुद्विजीवियों के मन में मौजूद थे। खुद हमारे देश की आबोहवा ऐसी हो गयी थी जिसमें नई फसल उग सकती थी। प्रगतिशील साहित्यआंदोलन का उद्देश्य इस नई फसल को पानी देना, इसकी निगरानी करना और इसे परवान चढ़ाना था।’’ कमोबेश आज सार्थक सामाजिक चेतना के लिए कला साहित्य और संस्कृति के प्रति उसी एकनिष्ठ लगाव, जोश, जुनून और हौसले की जरूरत है ताकि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजार, साम्राज्यवाद और भारतीय शासक वर्ग की देने वर्तमान सांस्कृतिक चुनौतियों का जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के जरिए रचनात्मक जवाब दिया जा सके। और यही पूरे सांस्कृतिक क्षेत्र को बदलने की क्षमता का आग़ाज़ होगा। जो भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन के इतिहास के पन्नों में दर्ज है।